लेखक: अनिल सिन्हा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में सुजुकी मोटर्स के कार्यक्रम में स्वदेशी की पुरजोर वकालत और उसकी नई व्याख्या से लोगों को चौंका दिया है। उन्होंने कहा, ‘पैसा किसका लगता है...वो डॉलर है, पाउंड है, वो करंसी काली है, गोरी है, मुझे कोई लेना-देना नहीं है। पैसा किसी का, पसीना हमारा। पैसा कहीं से आए, पसीना यहां का लगे।’
स्वदेशी का आह्वान: इससे पहले स्वाधीनता दिवस के संबोधन में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी को आंदोलन बनाने की अपील की थी। लोगों के मन में यह सवाल आना लाजिमी है कि भूमंडलीकरण और उदारीकरण के इस दौर में कोई राजनेता स्वदेशी की बात क्यों कर रहा है? भले ही स्वदेशी को आंदोलन में बदल देने की अपील अपने कार्यकाल में पहली बार कर रहे हों, वह ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के नारे पहले से देते रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या उनका यह आह्वान स्वदेशी की उस अवधारणा पर आधारित है जिसे गांधी जी ने औपनिवेशिक शिकंजे से मुक्ति पाने और शोषणमुक्त समाज बनाने के लिए अपनाया था?
ट्रंप-टैरिफ की चुनौती: क्या स्वदेशी की ओर उनका मुड़ना उनके आर्थिक चिंतन में बड़े बदलाव का संकेत है या तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के लिए जनता में उत्साह भरने भर का जरिया? मौजूदा हालात को देखें तो भारत की विदेश नऔर अर्थनीति को अपने अनुकूल मोड़ने के लिए डॉनल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए टैरिफ युद्ध से लड़ने के अलावा सरकार के पास कोई चारा नहीं रह गया है। हालांकि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की कोशिशें अब भी जारी हैं। लेकिन इसमें सबसे बड़ा रोड़ा भारत की विदेश नीति को पूरी तरह बदलने की ट्रंप की जिद है। कृषि क्षेत्र को ज्यादा से ज्यादा खोलने जैसे मुद्दे भी रुकावट बने हुए हैं।
राष्ट्रीय गौरव का सवाल: अमेरिका सिर्फ व्यापार नहीं करना चाहता, वह एक ऐसा पार्टनर चाहता है जो उसके सहायक की भूमिका में हो। वह चाहता है कि भारत, रूस या दुनिया के बाकी देशों से व्यापार ही नहीं सामरिक संबंध भी उसकी मर्जी के हिसाब से तय करे। जाहिर है कि भारत, पाकिस्तान की तरह उसका पिछलग्गू नहीं बन सकता। ऐसे में अपने फैसले खुद लेने की आजादी और राष्ट्रीय गौरव बरकरार रखने की सोचते समय स्वाधीनता संग्राम को याद करना और स्वदेशी का ध्यान आना स्वाभाविक ही है।
स्वावलंबन या स्वदेशी: जहां तक आत्मनिर्भरता की बात है तो तमाम प्रधानमंत्री उसका जिक्र करते रहे हैं। लालबहादुर शास्त्री ने तो अमेरिकी कानून पीएल 480 के तहत आने वाले गेहूं का आयात बंद कर दिया था क्योंकि अमेरिका इससे भारत की विदेश नीति प्रभावित करने की कोशिश में था। अमेरिकी गेहूं का आयात बंद होने से ही हरित क्रांति का रास्ता खुला और देश अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो सका। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी स्वाबलंबन के इस नारे को आगे बढ़ाया। लेकिन स्वदेशी को आंदोलन बनाने की घोषणा किसी ने नहीं की। वे बदलती दुनिया के साथ कदमताल को जरूरी मानते थे।
उदारीकरण की राह: नब्बे के दशक में आई उदारीकरण की नीति के बाद कहानी थोड़ी बदल गई। लेकिन कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई इस नीति को भी वाम दलों को छोड़ कर देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपना लिया। पीवी नरसिंह राव की नीतियों को अटल बिहारी वाजपेयी ने बढ़-चढ़ कर लागू किया। मनमोहन सिंह तो उदारीकरण की नीतियों के शिल्पकार ही थे। उनके बाद आई मोदी सरकार ने रक्षा समेत उन क्षेत्रों को भी विदेशी पूंजी के लिए खोल दिया जो सामरिक कारणों से बंद थे।
खादी का दर्शन: सवाल है कि क्या विदेशी पूंजी से भारत में बनी चीजों को स्वदेशी कहा जा सकता है? गांधी जी की राजनीति में स्वदेशी एक महत्वपूर्ण औजार थी। यह सिर्फ विदेशी चीजों के बहिष्कार और भारत में बनी सामग्रियों को अपनाने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने व लोगों की गरीबी कम करने के औजार के रूप में भी खादी को देखा। वह स्वदेशी के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपने पांव पर खड़ा करना चाहते थे।
सभ्यता पर संकट: क्या प्रधानमंत्री गांधी जी वाली स्वदेशी को सचमुच अपनाना चाहेंगे? इसके आसार नहीं दिखते। भले ही, प्रधानमंत्री इस मंत्र का इस्तेमाल सिर्फ ट्रंप टैरिफ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए करना चाहते हों, लेकिन स्वदेशी की चर्चा हमें गांधी के महान विचारों की ओर लौटने का रास्ता तो दे ही सकती है। युद्ध और क्लाइमेट चेंज की भयावह चुनौतियों से घिरी सभ्यता को बचाने के लिए ऊर्जा के सीमित इस्तेमाल और पूरी तरह स्थानीय अर्थव्यवस्था वाले विकल्प के अलावा कोई रास्ता नहीं है। असली स्वदेशी भी यही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में सुजुकी मोटर्स के कार्यक्रम में स्वदेशी की पुरजोर वकालत और उसकी नई व्याख्या से लोगों को चौंका दिया है। उन्होंने कहा, ‘पैसा किसका लगता है...वो डॉलर है, पाउंड है, वो करंसी काली है, गोरी है, मुझे कोई लेना-देना नहीं है। पैसा किसी का, पसीना हमारा। पैसा कहीं से आए, पसीना यहां का लगे।’
स्वदेशी का आह्वान: इससे पहले स्वाधीनता दिवस के संबोधन में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वदेशी को आंदोलन बनाने की अपील की थी। लोगों के मन में यह सवाल आना लाजिमी है कि भूमंडलीकरण और उदारीकरण के इस दौर में कोई राजनेता स्वदेशी की बात क्यों कर रहा है? भले ही स्वदेशी को आंदोलन में बदल देने की अपील अपने कार्यकाल में पहली बार कर रहे हों, वह ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के नारे पहले से देते रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या उनका यह आह्वान स्वदेशी की उस अवधारणा पर आधारित है जिसे गांधी जी ने औपनिवेशिक शिकंजे से मुक्ति पाने और शोषणमुक्त समाज बनाने के लिए अपनाया था?
ट्रंप-टैरिफ की चुनौती: क्या स्वदेशी की ओर उनका मुड़ना उनके आर्थिक चिंतन में बड़े बदलाव का संकेत है या तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के लिए जनता में उत्साह भरने भर का जरिया? मौजूदा हालात को देखें तो भारत की विदेश नऔर अर्थनीति को अपने अनुकूल मोड़ने के लिए डॉनल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए टैरिफ युद्ध से लड़ने के अलावा सरकार के पास कोई चारा नहीं रह गया है। हालांकि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की कोशिशें अब भी जारी हैं। लेकिन इसमें सबसे बड़ा रोड़ा भारत की विदेश नीति को पूरी तरह बदलने की ट्रंप की जिद है। कृषि क्षेत्र को ज्यादा से ज्यादा खोलने जैसे मुद्दे भी रुकावट बने हुए हैं।
राष्ट्रीय गौरव का सवाल: अमेरिका सिर्फ व्यापार नहीं करना चाहता, वह एक ऐसा पार्टनर चाहता है जो उसके सहायक की भूमिका में हो। वह चाहता है कि भारत, रूस या दुनिया के बाकी देशों से व्यापार ही नहीं सामरिक संबंध भी उसकी मर्जी के हिसाब से तय करे। जाहिर है कि भारत, पाकिस्तान की तरह उसका पिछलग्गू नहीं बन सकता। ऐसे में अपने फैसले खुद लेने की आजादी और राष्ट्रीय गौरव बरकरार रखने की सोचते समय स्वाधीनता संग्राम को याद करना और स्वदेशी का ध्यान आना स्वाभाविक ही है।
स्वावलंबन या स्वदेशी: जहां तक आत्मनिर्भरता की बात है तो तमाम प्रधानमंत्री उसका जिक्र करते रहे हैं। लालबहादुर शास्त्री ने तो अमेरिकी कानून पीएल 480 के तहत आने वाले गेहूं का आयात बंद कर दिया था क्योंकि अमेरिका इससे भारत की विदेश नीति प्रभावित करने की कोशिश में था। अमेरिकी गेहूं का आयात बंद होने से ही हरित क्रांति का रास्ता खुला और देश अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो सका। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी स्वाबलंबन के इस नारे को आगे बढ़ाया। लेकिन स्वदेशी को आंदोलन बनाने की घोषणा किसी ने नहीं की। वे बदलती दुनिया के साथ कदमताल को जरूरी मानते थे।
उदारीकरण की राह: नब्बे के दशक में आई उदारीकरण की नीति के बाद कहानी थोड़ी बदल गई। लेकिन कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई इस नीति को भी वाम दलों को छोड़ कर देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपना लिया। पीवी नरसिंह राव की नीतियों को अटल बिहारी वाजपेयी ने बढ़-चढ़ कर लागू किया। मनमोहन सिंह तो उदारीकरण की नीतियों के शिल्पकार ही थे। उनके बाद आई मोदी सरकार ने रक्षा समेत उन क्षेत्रों को भी विदेशी पूंजी के लिए खोल दिया जो सामरिक कारणों से बंद थे।
खादी का दर्शन: सवाल है कि क्या विदेशी पूंजी से भारत में बनी चीजों को स्वदेशी कहा जा सकता है? गांधी जी की राजनीति में स्वदेशी एक महत्वपूर्ण औजार थी। यह सिर्फ विदेशी चीजों के बहिष्कार और भारत में बनी सामग्रियों को अपनाने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने व लोगों की गरीबी कम करने के औजार के रूप में भी खादी को देखा। वह स्वदेशी के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपने पांव पर खड़ा करना चाहते थे।
सभ्यता पर संकट: क्या प्रधानमंत्री गांधी जी वाली स्वदेशी को सचमुच अपनाना चाहेंगे? इसके आसार नहीं दिखते। भले ही, प्रधानमंत्री इस मंत्र का इस्तेमाल सिर्फ ट्रंप टैरिफ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए करना चाहते हों, लेकिन स्वदेशी की चर्चा हमें गांधी के महान विचारों की ओर लौटने का रास्ता तो दे ही सकती है। युद्ध और क्लाइमेट चेंज की भयावह चुनौतियों से घिरी सभ्यता को बचाने के लिए ऊर्जा के सीमित इस्तेमाल और पूरी तरह स्थानीय अर्थव्यवस्था वाले विकल्प के अलावा कोई रास्ता नहीं है। असली स्वदेशी भी यही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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